इन्टरनेट और सोशल मीडिया की भाषा – Language of Internet and Social Media

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दोस्तों, इन्टरनेट और सोशल मीडिया की भी अपनी भाषा होती है। कोई माने या ना माने, SMS के ज़माने से ही एक नया सामानांतर शब्दकोष शुरू हो चुका है। अधिकतर शुद्धतावादी इन शब्दों का अस्तित्व ही कबूलने से इनकार करेंगे, लेकिन चोमस्की जैसे मीडिया पर लिखने वालों ने बरसों पहले ही इनके अस्तित्व और प्रभाव को स्वीकार कर लिया था। इन जुमलों के उदय का काल भी कोई आज का नहीं है। कुख्यात नाज़ी प्रचारक गोएबेल्स के ज़माने में ही ऐसे जुमलों का जमकर इस्तेमाल शुरू हो चुका था।

चोमस्की ऐसे शब्दों को प्रोपोगेन्डा का हिस्सा मानते हैं। उन्होंने ऐसे जुमलों के लिए नेम कालिंग (Name Calling) की परिभाषा दी थी। ये आम तौर पर मज़ाक उड़ाने वाले व्यंग जैसे शब्द या जुमले होते हैं। हालिया दौर को देखेंगे तो आपको ‘भक्त’ शब्द की याद आएगी। कुछ ऐसा ही ‘नफरती चिंटू’ भी है जिसे गोएबेल्स के उपासक इस्तेमाल करते हैं। ऐसे शब्दों के जरिये एक विशेष अतिवादी समूह अपने विरोधियों को नीचा दिखाने का प्रयास करता है।

धीरे धीरे वामपंथियों का ये तरीका आम लोग भी सीखने लगे हैं। हाल में ‘सेक्युलर’ शब्द का अर्थ बदलना इसका उदाहरण है। पहले जहाँ ये नेम कालिंग, एक अभिजात्य बुद्धिजीवी कहलाने वाले वर्ग की बपौती समझी जाती थी, वहीँ अब दोनों तरफ से इसका इस्तेमाल होता है। जब ट्विटर जैसे 140 करैक्टर की सीमा वाले माध्यम में तथाकथित बुद्धिजीवियों ने अपने विचारों पर सवाल या आपत्ति करने वालों से वर्तनी और व्याकरण की शुद्धता की उम्मीद शुरू की तो फ़ौरन ही ऐसे शुद्धतावादियों को ग्रामर नाज़ी (‪#‎GrammarNazi‬) विशेषण से विभूषित किया जाने लगा।

इसी कड़ी का एक शब्द ‪#‎आदर्श_लिबरल‬ भी है। अजीब मूर्खतापूर्ण तरीकों और तर्कों से अकारण ही विरोध करने आ जुटे मूर्खों को अब सीधा मूर्ख ना कहकर आदर्श लिबरल पुकारा जाता है। आदर्श लिबरल शब्द की उत्पत्ति भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों द्वारा होना थोड़ा संदेहास्पद लग सकता है। जहाँ दो राजनैतिक दलों वाली व्यवस्था है वहां अक्सर लिबरल और डेमोक्रेट नाम की पार्टियाँ होती हैं। लिबरल शब्द शायद वहीँ वाले अर्थ में प्रयुक्त होता है। लेकिन इसके आगे जुड़ा ‘आदर्श’ शब्द निस्संदेह भारतीय है, इसलिए ‘आदर्श लिबरल’ का मूल भारतीय ही होगा।

इस कड़ी में जो नया शब्द जुड़ा है, वो है ‪#‎Dhimmi‬ या फिर धिम्मी के पीछे attitude शब्द को जोड़कर ‪#‎Dhimmitute‬ भी इस्तेमाल होता है। इसको समझना हो तो हाल की घटनाओं को याद कीजिये। जिस समय अख़लाक़ की हत्या हुई थी उसी दौर में road rage जैसे मामले में एक व्यक्ति की दिल्ली में पीट पीट कर हत्या कर दी गई थी। यहाँ सारे हत्यारे चूँकि समुदाय विशेष से थे इसलिए उस मामले को कोई तूल नहीं दी गई। बिल्ली को देखकर कबूतर की तरह आँख बंद किये बैठा मीडिया बिलकुल चुप रहा।

दूसरी बार ऐसा तब हुआ जब लोग किसी छात्र की आत्महत्या को राजनैतिक रंग देने में जुटे थे। एक गरीब, कूड़ा बीनकर गुजारा करने वाले युवक को सिर्फ इसलिए जिन्दा जला दिया गया क्योंकि उसका नाम हिन्दुओं वाला था। इस मामले में भी सभी हत्यारे एक समुदाय विशेष के थे। पुणे में हुई एक मिलती जुलती घटना पर जहाँ ‘Pune techi killed’ का शोर मचा था वहीँ ‪#‎Dhimmitude‬ दिखाते हुए इस घटना को कोई कवरेज नहीं दी गई।

#Dhimmi क्या होता है ये समझने के लिए अभी बिलकुल ताज़ा उदाहरण देखिये जिसमें एक डॉक्टर को पीट पीट कर मार दिया गया। वो भी इसलिए क्योंकि बाप-बेटे की गेंद शायद क्रिकेट खेलते समय सड़क पर चली गई थी, और उसे उठाने गए बेटे की मदद के लिए बाप ने एक स्कूटी वाले को गाड़ी जरा धीमी करने कह दिया ! थोड़ी ही देर में एक समुदाय विशेष की भीड़ स्कूटी वाले युवकों के साथ वापिस आई और पीट पीट कर डॉक्टर को मार डाला। हत्यारी भीड़ के गिरफ्तार लोगों में एक महिला भी शामिल है। यहाँ गौर करने लायक उस डॉक्टर के मोहल्ले वालों का #Dhimmitude भी है। मोहल्ले का एक आदमी पिट कर मर गया और कोई उसका बचाव करने भी नहीं आया !

इस अनोखे बर्ताव को #Dhimmitude कहते हैं। ऐसा बर्ताव करने वालों, होने पर आँख मूँद कर ‘नहीं, नहीं, बेटा कुछ भी नहीं हुआ ! क्षणिक आवेष का मसला था !’ जैसे वक्तव्य देने वाले सभी जीव #Dhimmi हैं। ठीक राजधानी दिल्ली में हुई इस घटना को कवर करने पत्रकारों को कहीं दूर भी नहीं जाना पड़ता। लेकिन ज्यादातर मीडिया मंडी के दलाल इस घटना को दिखायेंगे भी नहीं, #Dhimmi शब्द उनके लिए भी है। किसी एक बिरादरी के प्रति पूर्वाग्रह भरा ‘असहिष्णुता’ का उनका भाव, उन्हें समुदाय विशेष के प्रति ‘लिबरल’ बनाता है। इसे भी #Dhimmitude कहना चाहिए।

यहाँ गौर कीजिये की मोहल्ले के लोग बचाने क्यों नहीं आये होंगे ? दरअसल लाठी-डंडों से मुकाबला करने के लिए उनके घरों में हथियार नहीं थे इसलिए नहीं आये। ऐसी आपात स्थितियों के लिए उन्होंने कोई अभ्यास नहीं किया था इसलिए भी उनके हाथ पांव जम गए होंगे। ऐसा होते आप एक बार नहीं कई बार देख सकते हैं। हर उदाहरण में ऐसा ही होगा। आपात स्थिति में तैयारी के बिना आदमी मुकाबला नहीं कर सकता। लेकिन जब हम ऐसे लोगों को कहेंगे की भाई जाकर chichen की दुकान पर खड़े हो जाओ, खून देखकर हाथ पांव ठन्डे ना पड़ें इसकी आदत पड़ेगी। दिमाग काम करना बंद नहीं करेगा ऐसे हाल में तो क्या होगा ?

जब तक एक्सीडेंट में सर न फट जाये तब तक जैसे लौंडो को हेलमेट पहनना समझ नहीं आता, वैसे ही जब तक आंच खुद का घर ना जलाने लगे तब तक बुद्धि नहीं खुलेगी #Dhimmi लोगों की ! तैयारी करो, सावधानी में ही सुरक्षा है !

साभार – श्री आनंद कुमार – फेसबुक व्यक्तित्व

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Comments(3)

  1. March 30, 2016
  2. April 25, 2016
  3. July 17, 2017

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