कपड़ा लेइ जा रे – Real Story Of Footpath Cloth Vendors

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दोस्तों और मेरे आदरणीय पाठकों, इंसान पहले जंगलों में रहता था. पेड़ों के पत्ते ओढ़ता था, तब उसे खानाबदोस कहते थे. बिना कपड़े रोटी कमाने निकले तो लोग पागल कहते हैं. जो जितना अच्छा कपड़ा पहनता है, उसे उतना ही सभ्य  माना जाता है.  तुर्भे नाका, मुंबई में हर रविवार एक ऐसी बाजार सजती है, जहां तन ढकने के लिए मनचाहे कपड़े मिल जाते हैं. भले ही वो नए नहीं होते. लेकिन दिन भर पत्थर खदानों में पहाड़ का सीना चीर कर मजदूरी कमाने वालों के लिए ये सिर्फ कपड़े होते हैं जिनसे तन ढकता है. जिसे पहनने के बाद लोग आदम नहीं इंसान नजर आते हैं. बिन कपड़े का मानव तो पहले भी आदम था आज भी आदम कहलाता है, इसलिए कि हुकूमतों से हालात नहीं बदले तो लोग मुफलिसी के शिकार होते गए. कह सकते हैं कि कपड़ा बाजार भी इसी मुफलिसी की पैदाइस है. 

40 में पतलून-70 में साड़ी : यह बाजार नवी मुंबई के हजारों गरीबों-मजदूरों और तंगहाल परिवारों के लिए कपड़ों की जरुरत पूरा करता है. अगर ऐसे बाजार न हों तो क्या हिंदुस्तान का हर इंसान सभ्य रह पायेगा? रोटी के बाद कपड़े की जरुरत दूसरे नंबर पर है, और मकान सबसे बाद में. लेकिन नए दौर में पहले कपड़ा चाहिए फिर रोटी. पुरषोत्तम जो की एक ऐसा ही दुकानदार है जो कहता है फुटपाथ की दुकान पर शर्ट-पैंट बेचकर क्या मिलता है साब, लोग पुराने कपड़ों के लिए भी पचास मोल भाव करते हैं. जवान लोगों की शर्ट 10 रुपए से लेकर 30-35 रुपए में और पतलून 40 से 60 रुपए में बेचना पड़ता है. यहां 70 से 100 रुपए में साड़ी, 15 में ब्लाउज, 20 में कुर्ता, 25 में सलवार कमीज और 10-15 में बच्चों के कच्छे, टीशर्ट और कुर्ते मिल जाते हैं।

कपड़ों से जलता है घर का चूल्हा : कभी सुने हैं कि कपड़ों से घर-गृहस्थी चलती है. मुलुंड से अपनी ननद किशोरी के साथ बाबा-बेबी के फ्राक और शर्ट बेचने आयी बिन्द्रा कहती है कि कपड़े न बिकें तो घर का चुल्हा नहीं जले. बिंद्रा जोर से आवाज देती है – ” साड़ी-ब्लाउज ले लो”. खरीददार ग्राहक कपड़ों की डिजाईन नहीं कीमत देखते हैं. उसकी पुरानी व चमकदार साडिय़ां 100 से 200 में बिकती हैं. 50 साल की अधेड़ शकुन्तला अपने अधेड़ पति पुरषोत्तम के साथ नवी मुंबई, वड़ाला, कुर्ला, तलोजा और कर्जत तक बाजार हाट सजाती है. वह कहती है पुराने कपड़ों से गरीबों का बदन ढकता है और हमारी घर-गृहस्थी चलती है।

बर्तन देकर आते हैं कपड़े : बाजार सजाने वाले बताते हैं कि बाबा-बेबी से लेकर भैया भाभी, चाचा-मामा सबके लिए मनचाही कीमत में बदन ढ़कने वाले ये कपड़े बर्तन देकर लाए जाते हैं. फेरीवाली महिलाएं प्लास्टिक और स्टील के बर्तनों के बदले पुराने और बिन फटे ऐसे वस्त्रों  को इकट्ठा करती हैं. घर-घर से इकट्ठा  होने वाला यही कपड़ा रविवार पेठ जैसी फुटपाथी बाजारों में बिकता है. कुछ लोग इसे गोदी का माल जबकि कुछ लोग अमीरों द्वारा छोड़ा हुआ कपड़ा कहकर भी बेचते हैं.

साभार : श्री सुधीर शर्मा जी

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