भगवान शंकर – योगा के विश्व गुरु – Lord Shankar – World Yoga Guru

Share this:
apnikahaani.blogspot.com

दोस्तों और मेरे आदरणीय पाठकों, आज का दिन आप सभी के लिए शुभ हो। योगविद्या का उद्भव हजारों वर्ष पूर्व हुआ , योग शिक्षा के अनुसार ” भगवान शिव ” को ही प्रथम योगी तथा आदिगुरु के रूप में देखा जाता है। कई हजार साल पहले हिमालय में कांतिसरोवर झील के किनारे पर अदियोगी ने अपने गहरे ज्ञान को पौराणिक सप्तऋिषियों को प्रदान किया।

ये ऋषि इस शक्तिशाली योग विज्ञान को एशिया, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिका सहित अनेकों भागों में लग गए।  आधुनिक विद्वान हैरान हैं कि पूरे संसार की प्राचीन संस्कृतियों में गहरी समानता है। किन्तु केवल भारत मे ही योग परम्परा पूरी तरह से विकसित हुई। अगस्त्य सप्तऋषि जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा की, ने एक मूल योग जीवन शैली के चारों और इस संस्कृति का निर्माण किया।

शिव को स्वयंभू इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वे आदिदेव हैं, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था सिर्फ वही थे, उन्हीं से धरती पर सब कुछ हो गया। ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर प्रारम्भ में उनका निवास रहा। 
वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। फिर जब समुद्र का स्तर कम हुआ तो पृथ्वी के अन्य क्षेत्र प्रकट हुये।

शिव कहते हैं ‘ मनुष्य पशु है ‘- इस पशुता को समझना ही योग और तंत्र का प्रारम्भ है। 
योग में मोक्ष या परमात्मा प्राप्ति के तीन मार्ग हैं- जागरण, अभ्यास और समर्पण।

तंत्रयोग है समर्पण का मार्ग। जब शिव ने जाना क‍ि उस परम तत्व या सत्य को जानने का मार्ग है, तो उन्होंने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु वह मार्ग बताया।

शिव द्वारा माँ पार्वती को जो ज्ञान दिया गया वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। 
उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएँ हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों मे सम्मिलित हैं । 
‘ विज्ञान भैरव तंत्र ‘ एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।
योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के ‘‍ विज्ञान भैरव तंत्र ‘ और ‘ शिव संहिता ‘ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है।  तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। 
भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है।

भगवान शिव के अनुसार – ‘ वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:’ 
अर्थात वाम मार्ग अत्यन्त गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है।

शिवयोग में धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात योग के अंतिम तीन अंग का ही प्रचलन अधिक रहा है।

पतंजलि के बाद बहुत से ऋषियों और योग गुरुओं ने अच्छी तरह से लिखे गए अभ्यासों और साहित्य के माध्यम से इस विषय को संरक्षित करने और इसका विकास करने में महान योगदान दिया, 
जिसमे बाबा रामदेव का उल्लेखनीय योगदान है । प्राचीन समय से लेकर आज तक प्रमुख योग गुरुओं की शिक्षाओं के माध्यम से योग संसार भर में फैला है। योग अभ्यास बीमारियों से बचाता है, स्वास्थ्य को बनाए रखता है तथा स्वस्थ जीवन प्रदान करता है ।
!! ॐ नमः शिवाय !!

साभार – एक Facebook मित्र

Share this:

Leave a Reply