पैसे के लिए मेहनत करते मासूम – Kids Working for Money for Survival – श्री सुधीर शर्मा जी

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छोटू

दोस्तों और मेरे आदरणीय पाठकों, एक गाना याद आता है -”नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है, मुट्ठी में है तकदीर तुम्हारी..” इस गाने से उलट शहर के गली-मुहल्लों में कचरा चुनते और भीख मांगते कुछ बच्चों को देखकर सवाल उठता है कि अगर मुट्टी में तकदीर है तो फिर देश के इन नौनिहालों को खेलने की उम्र में जीने के लिए यूं मशक्कत क्यों करनी पड़ रही..इलाहबाद का मोनू, सानपाड़ा की रोशनी और नेरुल का छोटू, सब बेहाल हैं. ये वो मासूम हैं जिनके नाम भले अलग हैं लेकिन हालात एक जैसे.  देश में छोटू व मोनू जैसे न जाने कितने ही नौनिहाल हैं जो घर की गरीबी, पेट की भूख और बेबशी के लिए अपने भविष्य को बेचने के लिए मजबूर हैं. देश के कानून और कल्याण योजनाओं से अछूते. शहर की सड़कों पर ऐसे कितने ही मासूम रोज भीख मांगते हैं, गाडिय़ों का शीशा पोछते हैं. भूखे पेट के लिए मदद  की याचना करते हैं. नंगे बदन , फटे चिथड़े में..पुर्व प्रधानमंत्री चाचा नेहरू के शब्दों में कहें तो ये बच्चे आने वाले भारत के भविष्य हैं…..

पढ़ लिया तो धंधे पर जाओ
अब जरा 13 साल के इस छोटू से मिल लिजिए. दूसरे बच्चों की तरह खेल-कूद, मौज-मस्ती उसे भी पसंद है लेकिन आर्थिक तंगी में कई भाई-बहनों की परवरिश कर रहे पिता शरीफ के लिए वह छोटे हाथ वाला मदद का मसीहा है. स्कूल से लौटकर बस्ता रखते ही उसका बाप कहता है पढ़ के आ गया अब धंधे पे निकल जा…खेलने की चाहत के बावजूद बाप का फरमान मानना उसकी मजबूरी है. भाड़े की खोली में मां-बाप का बनाया कैन्डी लिए वह शहर के स्कूल-उद्यानों और गली-मुहल्लों की खाक छानता है.  कैन्डी बेचना उसका रोज का धंधा है.
रोशनी
रोटी के लिए मेहनत जरुरी है
जमीन से 15 फूट उपर पतली रस्सी के सहारे एक पांव पर झूलती रोशनी किसी स्कूल में नहीं जाती लेकिन लोहे की रिंग और रस्सियों पर सर्कस का खेल दिखाकर रोज सौ-दो सौ कमा लेती है. उसका बाप भगीरथ कहता है- साब गरीब हैं, काम नहीं करेंगे तो घर कैसे चलेगा. जीने के लिए पैसे नहीं हैं फिर बच्चे कैसे पढ़ाएं. 6 साल का मोनू इलाहाबाद के संगम तट पर प्लास्टिक के  डिब्बे बेचते हुए मिला था.वह ठीक से अपना नाम भी नहीं बोल पाता लेकिन गंगा घाट पर आने वालों से कहता है-डिब्बा ले लो भाई, गंगा जल भर लेना. 
आधा दिन: पूरे घर की कमाई
इन तीन और स्कूली बच्चों को भी देख लीजिये। ये हैं राजेश, किशन और विशाल। तीनों महानगर पालिका विद्यालय में पढ़ते हैं.  आधे दिन के  बाद  इनकी जिन्दगी की असली जद्दोजहद शुरू होती है.  दोपहर बाद एपीएमसी मार्केट के बड़े व्यापारियों के यहाँ से सस्ती सब्जियां और फल चुनते हैं. बड़ी बाजार के सामने चटाई पर दुकान सजाते  हैं. माल बिका तो 100 से 200 रूपए कमा लेते हैं.  स्कूल ड्रेस में रोज धंधे का यही वसूल चलता है. ये वो बच्चे हैं जो भीख नहीं मांगते , मेहनत करते हैं।
हौसले को सलाम
किशन, विशाल और राजेश
अधूरी जिंदगी में पूरे परिवार की कमाई का जरिया है, इनका कारोबार। जिस पर चूल्हा जलता है,जिस पर जिंदगी की गाड़ी चलती है। आपके शहर-गांव में भी ऐसे कई रोशनी, छोटू , मोनू मिल जाएंगे जिनकी मेहनत के पीछे  आधी सदी की आजादी का दिवालियापन, दर-दर भटकने का दर्द, मौज की बजाए मुफलिसी  और मजबूरी साफ झलकती है. मनी के लिए मेहनत करते इन मासूमों से रुबरू होकर आप भी अंदाजा लगाइयेगा, तब शायद आपको भी हिन्दुस्तान की 67 सालों की स्वाधीनता पर कोफ्त आ जाए.
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साभार – श्री सुधीर शर्मा जी 
हम श्री सुधीर शर्मा जी का इस वास्तविक,मार्मिक और सम सामायिक रचना हमारे ब्लॉग पर प्रेषित और प्रकाशित करवाने के लिए दिल से आभार प्रकट करते हैं।
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Comments(2)

  1. February 20, 2015
  2. February 20, 2015

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