सपना बाबू – हिंदी कहानी – Sapna Babu Hindi Story

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सपना बाबू – अनिल पतंग

अपनी कहानी की तरफ से अनिल पतंग जी को यह कहानी हमारे साथ शेयर करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्!

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कबाड़ वाला किताबों को बोड़े में कस रहा है। कुछ पुरानी पत्रिकाओं और अखवारों का बंडल भी है उसमें। उसे देखकर ऐसा लग रहा है कि उन किताबों का बोझ मेरे सीने पर पड़ रहा है। पूछने पर पता चला कि कुल ढ़ार्इ सौ में बिका है। मुहलले के नंग-धरंग बच्चे उड़ते हुए पृष्ठों को लेकर पतंग बना रहे हैं। एक पेज मेरे निकट भी उड़ कर आया। उठाया तो देखा उसमें सपना बाबू की छवि है, खूब रोया। आज भी मैं उनकी ही कृपा से यहां चटट बिछाकर जूते सीता हूं। कागज के टुकड़े को सिर से लगाया, मोड़कर जेब के हवाले किया। सारी स्मृतियां एक-एक कर उभरने लगती है।


जब से मैं शहर आया था, घूम-घूम कर जूते सीता और पालिस करता था। इसी क्रम में कर्इ बार सपना बाबू के चप्पल और जूते सीने का मौका लगा। कर्इ बार उनके चप्पल देने के लिए उनके घर के अन्दर गया तो घर के अन्दर किताबों की दुकान सी लगी। कभी-कभी उन किताबों को झाड़ते-पोंछते और धूप में सुखाया करते थे। न जाने कया-क्या पढ़ते-लिखते रहते थे। इतना तो आजकल का इसकुलिया लड़का भी नहीं पढ़ता लिखता है। डाकपीन आता तो एक झोला चीठी और किताबें दे जाता। रोज-रोज पता नहीं कौन लिखता होगा इतनी चिटिठयां?

एक दिन उनके घर में उनका चप्पल सी रहा था। मालकिन चाय दे गयी। ”प्रभु जी चाय पीयेंगे? पूछा उन्होंने। मैं भला इतने बड़े आदमी के घर कैसे चाय पीता। उत्तर न पाने पर वे बोले-”एक चाय और। चाय आर्इ, पीने जो लगा तो मत पूछिये, ऊंची दुकान फीकी पकवान। न जाने मेरे लिए मालकिन ने ऐसी चाय बनार्इ या ऐसी ही चाय बनती है। जो भी हो, उनके कहने पर मैं अपना चटट उनके मकान के सामने ही बिछाने लगा और दाल-रोटी के लायक कमाने लगा। इसे आज बीस बरस से चला रहा हूं।

फुर्सत के समय पूछ लेता साब जूते? फिर आते-जाते राम सलाम हो जाता। रोज नौ बजे कालेज जाते थे, प्रोफेसर साहब। धोती-कुर्ता और गर्मी-बरसात के समय हाथ में छाता होता था। वे शाम को तीन-चार बजे लौटते, कभी कुछ पहले भी आ जाया करते। उनके बाल-बच्चों का ठाठ-बाट काफी ऊंचा था। वे लोग मुझे प्रभुआ कहते थे। आते-जाते जूते झड़पाते, पालिस करवाते। पालिस-मरम्मत के पैसे देने की जरूरत भी कहां थी, उनके गेट पर दुकान जो लगाता था। 

भला हो सपना बाबू का, जो जब भी काम कराते, मेरे ना ना करने के बाद भी पैसे दे देते थे। मेरी क्या मजाल कि इन्कार करता। जब सपना बाबू कालेज जाते तो उनके जाते ही घर में उधम सी मचने लगती। उनके बेटों के दोस्त आने लगते। कभी-कभी मोटर और स्कूटरों पर कालेजिया लड़कियां भी आती। खूब हू-हा होता, दो तीन बजे तक सब हुड़दंग समाप्त हो जाता। सपना बाबू को आते ही घर में मातम छा जाता। लगता सभी एकाएक बीमार हो गये हैं। उन्हें दिल खोलकर कभी हंसते हुए नहीं देखा, वे न जाने क्यों, हमेषा दुखित रहते।

एक दिन पता चला कि सपना बाबू कुछ दिनों के लिए बाहर चले गये। मुझे चिन्ता हुर्इ कि कहीं इस बीच मेरा आश्रय न छिन जाय। दो-तीन महीनों में घर उत्सव सा सज गया। प्रत्येक दिन गरम मशालों की गंध, मछली की छिछियैनी, कभी सुगन्ध की बहार,कभी फिल्मी गानों की झंकार-वाह! आनन्द आ गया। लगता है सपना बाबू बड़े मनहूस आदमी हैं। देखिये, इनका परिवार कितना खुशहाल है। कितने अच्छे-अच्छे लड़के-लड़कियों का रोज-रोज आना, जलसा पार्टी और न जाने क्या-क्या? इसी बीच मालकिन भी मायके चली गयी। शायद उनके नशीब में भी यह आनंद नहीं था। सपना बाबू के बेटों के ठाठ-बाट, वाह! कमार्इ इसे कहते हैं। बेटों को खूब सजा-संवार के रखते थे। जूते ऐसे कि आधा वजन वहीं लगा हो।

सपना बाबू लौटे। सुना कि बाहर खूब सम्मान मिला था। बड़े विद्वान आदमी थे तभी तो अखवार में उनका फोटो छपता था। राष्ट्रपति से हाथ मिलाते थे। यह बंंडी जो मेरे देह पर देखते हैं, सपना बाबू का ही दिया हुआ है। एक दिन मैं ठंड में काम करते समय ठिठुर रहा था। मेरी हालात देखकर उन्होंने मेरे ना-नुकर करने के बाद भी यह बंडी थमा दिया था। एक दिन उनके छोटे शाहजादे ने कहा था-”प्रभुआ, इस बंडी को तुम कहां से लाया? यह तो मेरे पापा की है। मैनें संजीदगी के साथ कहा-” मालिक ने दिया है। ”हुंह कहकर चले गये मानो उन्हें यह अच्छा नहीं लगा।

सपना बाबू बड़े गुस्सैल थे। शाम को घर आते ही गुस्सा करने लगते। बेटों पर बिगड़ते, मालकिन को गलियाते। बाप रे बाप, इतने बड़े कालेज के प्रोफेसर कहीं राड़ की तरह औरत को गाली देता है। छि: छि:, उनकी यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती। बेटों पर राशन की चीनी-तेल नहीं लाने पर बिगड़ते, मुझे और भी अच्छा नहीं लगता। इतने बड़े बाप के बेटे भला राशन की लार्इन में खड़े होगे। लोग क्या कहैंगे? यही हालत रसोर्इ गैस का भी होता, टेलिफोन बिल भी बिगड़ने का कारण हुआ करता है। कभी बिना फार्इन के जमा ही नहीं होता। कंजूस तो एक नम्बर। इतना बड़ा आदमी इन कामों के लिए एक नौकर नहीं रख सकते? डरते-डरते एक दिन पूछ बैठा तो वे बिफर पड़े-” प्रभु मेरे दिल में दुखों की दरिया बह रही है। मेरे पिता बचपन में मर गये। मैं कैसे पढ़ सका इसकी एक लम्बी कहानी है। न कभी पूरी किताब-कापियां हुआ करती थी, न समय पर फीस। फिर भी वर्ग में हमेषा फस्र्ट आता था।

…… बाद के दिनों में सुना है, पूरे विष्वविधालय में फस्ट होते थे। आज उनके बेटे , जिन्हें सभी सुख सुविधायें  प्राप्त है, एक-एक क्लाष में कर्इ कर्इ वर्ष लगाते हैं। उनके आंखों में आंंसू झड़ने लगे, जब उन्होंने बतलाया कि लोग पूछते हैं-”बेटे क्या कर रहे हैं? मैं शर्म से गड़ जाया करता हूं। लगता है सारी प्रोफेसरी उनपर अटटाहास करती है। घर में रोज-रोज कलह होता है। श्रीमती जी कहा करती हैं बच्चों को पास कराने के लिए पैरवी का सहारा लेने, एडमिषन के लिए डोनेषन देने, जो मेरे  बजूद के खिलाफ है।

एक दिन दोपहर के समय सपना बाबू बैठकर टी.वी. पर समाचार सुन रहे थे। शायद छुटटी का दिन था। मेरे पास भी कोर्इ काम नहीं था उस समय। सोचा क्यों नहीं उनके जूते मांग कर पालिस कर दू। दबे पांव  दरबाजे पर  पहुंचा तो बड़े प्यार से उन्होंने मुझे बुलाया। वे बहुत दुखी थे। शायद घर में कोर्इ नहीं था। पूछने पर पता चला कि वे लोग सिनेमा देखने गये हैं। 

आजकल के नौजवान लोग सिनेमा के प्रेमी हो गये हैं। बाजार में सिनेमा का फोटो देखकर तबियत खुष हो जाती है। सपना बाबू को न जाने सिनेमा काहे अच्छा नहीं लगता है? पूछने पर फिर रोने लगे। न मालूम इनकी आंख है या आंसू का दरिया। लगा कि बेकारे पूछा। कहने लगे कि उनकी घरवाली कभी घरवाली जैसी नहीं लगी। उनके हाथ न भरपेट खाना और न अच्छा कपड़ा नशीब हुआ। बातें तो जिन्दगी भर नहीं कर सके। हमको अचरज हुआ, तीन चार बच्चे केसे हुए? बच्चा होयबे किया तो पत्नी घरवाली जैसी कैसे नहीं लगी? कभी घरवाली के साथ कहीं जातें नहीं देखा किसी ने। येहो दुरभागे है। उस दिन की चाय याद आ जाती है।

इधर वे बीमार रहने लगे थे। कभी गैसिटक, कभी ब्लड प्रेसर, कभी सर्दी तो कभी खांसी से परेषान रहा करते थे। रात में गुस्सा से चिल्लाते थे तो कोर्इ आदमी अन्दर नहीं जाता था। सपना बाबू कहा करते थे कि बुढ़ापा में उनकी कोर्इ सेवा नहीं करेगा। सचमुच जरूरत नहीं हुर्इ। रिटायर होने के पहले ही गुजर गए, बरेन हुमरेज न जाने कौन बीमारी होती है। खूब भोज-भात हुआ घर के लोग खुष थे। सुना है मालकिन को पिलसिन तथा बेटा को नौकरी मिली। खूब पैसा मिला। घर दुमहला हो गया।

ठेला वाला किताबों का बंडल लिए जा रहा है। मैं कभी उस ठेला को और कभी हाथ में पकडे़ हुए पेज पर सपना बाबू की छवि को निहार रहा हूं।

साभार : अनिल पतंग,
संपादक, रंग-अभियान, बाघा, पो.-एस. नगर, बेगूसराय (बिहार) – 851218

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Comments(2)

  1. July 2, 2013
  2. July 2, 2013

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