मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना – Religion do not teach to fight

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मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्ता हमारा ||

जब कभी भी अल्लामा इक़बाल का यह शेर किसी से सुनता हूँ तो सोचता हूँ की क्या वाकई हम इस पर अमल कर रहे हैं या यदाकदा इस शेर को सुनकर इसका उपहास कर रहे हैं | शायर नें कभी यह सोचा भी नहीं होगा जिस एकता का सन्देश वह दे रहें हैं देश की आने वाली पीढ़ी उसे तार तार करने पर आमादा हो जायेगी | यहाँ मेरा उद्देश्य किसी जात, धर्म या सम्प्रदाय से नहीं है अपितु सारी मानव जात से है | ग्रन्थ चाहें वह किसी धर्म के हों हिंसा की कहीं पर आज्ञा नहीं देते हैं धर्म के तथाकथित ठेकेदारों नें अपनी अपनी धार्मिक दुकानें चलानें के लिए साम दाम दंड भेद इन चारों नीतियों को अपना रखा है और हम उनकी बातों में फसकर अपने उन संतों के आदर्शों को भूलते जा रहें है जो हमें सद्भाव और मैत्री की शिक्षा देते हैं | हम स्वार्थवश यह भी भूलते जा रहे हैं की हमारे पैगम्बर और अवतार हमें जो 
ज्ञान और शिक्षा देकर गए हैं वह आज भी हमारे सर्व मान्य ग्रंथों में स्वर्णाक्षरों में उचित प्रकार से मौजूद है हम अवतारों और पैगम्बरों के नाम पर आडम्बर तो बहुत करते हैं परन्तु उनके मूल उद्देश्यों से भटकते जा रहें हैं | अगर हम आपस में भाईचारा रखते हुए सबसे प्रेम का व्यवहार रखेंगे तभी सर्वधर्म समभाव् और अहिंसा परमोधर्मः का अर्थ स्पष्ट कर पायेंगे, जो हमारी आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करने में सर्वोत्तम सहायक सिद्ध होगा|

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Comments(5)

  1. July 3, 2013
  2. July 3, 2013
  3. July 3, 2013
  4. July 3, 2013
  5. June 9, 2017

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