भगवान शिव का वरदान रुद्राक्ष – Lord Shiv boon Rudraksha

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दोस्तों,एक बार देवर्षि नारद ने भगवान नारायण से पूछा – दयानिधान! रुद्राक्ष को श्रेष्ठ क्यों माना जाता है? इसकी क्या महिमा है? सभी के लिए यह पूजनीय क्यों है? रुद्राक्ष की महिमा को आप विस्तार से बताकर मेरी जिज्ञासा शांत करें।” देवर्षि नारद की बात सुनकर भगवान् नारायण बोले – “हे देवर्षि! प्राचीन समय में यही प्रश्न कार्तिकेय ने भगवान् महादेव से पूछा था। तब उन्होंने जो कुछ बताया था, वही मैं आपको बताता हूँ”

“एक बार पृथ्वी पर त्रिपुर नामक एक भयंकर दैत्य उत्पन्न हो गया। वह बहुत बलशाली और पराक्रमी था। कोई भी देवता उसे पराजित नहीं कर सका। तब ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र आदि देवता भगवान शिव की शरण में गए और उनसे रक्षा की प्रार्थना लगने लगे। 


भगवान शिव के पास ‘अघोर’ नाम का एक दिव्य अस्त्र है। वह अस्त्र बहुत विशाल और तेजयुक्त है। उसे सम्पूर्ण देवताओं की आकृति माना जाता है। त्रिपुर का वध करने के उद्देश्य से शिव ने नेत्र बंद करके अघोर अस्त्र का चिंतन किया। अधिक समय तक नेत्र बंद रहने के कारण उनके नेत्रों से जल की कुछ बूंदें निकलकर भूमि पर गिर गईं। उन्हीं बूंदों से महान रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए। फिर भगवान शिव की आज्ञा से उन वृक्षों पर रुद्राक्ष फलों के रूप में प्रकट हो गए।

ये रुद्राक्ष अड़तीस प्रकार के थे। इनमें कत्थई वाले बारह प्रकार के रुद्राक्षों की सूर्य के नेत्रों से, श्वेतवर्ण के सोलह प्रकार के रुद्राक्षों की चन्द्रमा के नेत्रों से तथा कृष्ण वर्ण वाले दस प्रकार के रुद्राक्षों की उत्पत्ति अग्नि के नेत्रों से मानी जाती है। ये ही इनके अड़तीस भेद हैं। 

ब्राह्मण को श्वेतवर्ण वाले रुद्राक्ष, क्षत्रिय को रक्तवर्ण वाले रुद्राक्ष, वैश्य को मिश्रित रंग वाले रुद्राक्ष और शूद्र को कृष्णवर्ण वाले रुद्राक्ष धारण करने चाहिए। रुद्राक्ष धारण करने पर बड़ा पुण्य प्राप्त होता है। जो मनुष्य अपने कण्ठ में बत्तीस, मस्तक पर चालीस, दोनों कानों में छः-छः, दोनों हाथों में बारह-बारह, दोनों भुजाओं में सोलह-सोलह, शिखा में एक और वक्ष पर एक सौ आठ रुद्राक्षों को धारण करता है, वह साक्षात भगवान नीलकण्ठ समझा जाता है। उसके जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। रुद्राक्ष धारण करना भगवान शिव के दिव्य-ज्ञान को प्राप्त करने का साधन है। सभी वर्ण के मनुष्य रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं। रुद्राक्ष धारण करने वाला मनुष्य समाज में मान-सम्मान पाता है। 

रुद्राक्ष के पचास या सत्ताईस मनकों की माला बनाकर धारण करके जप करने से अनन्त फल की प्राप्ति होती है। ग्रहण, संक्रांति, अमावस्या और पूर्णमासी आदि पर्वों और पुण्य दिवसों पर रुद्राक्ष अवश्य धारण किया करें। रुद्राक्ष धारण करने वाले के लिए मांस-मदिरा आदि पदार्थों का सेवन वर्जित होता है।”

हिंदू धर्म में सदियों से पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन जैसे शुभ कार्यो में रुद्राक्ष का प्रयोग किया जाता है। रुद्राक्ष के बिना कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता। अब तो वैज्ञानिक अनुसंधानों के माध्यम से पूरी दुनिया में रुद्राक्ष की गुणवत्ता साबित हो चुकी है। इसके अद्भुत औषधीय गुण प्रयोगशाला में जांच के बाद सही साबित हुए है। इसे धारण करने से शरीर स्वस्थ और मन शांत रहता है।

शिव की रूद्र की भावनाओं का अखंड भंडार, रूद्र- नेत्र-जल भी यही रुद्राक्ष है.

यहाँ तकनीकी रूप या व्याकरण के अनुसार शिव, रुद्र, अक्ष, वृक्ष एवं जल ये पांच तत्व विराजमान हैं रुद्राक्ष नाम में शिव को वायु, रूद्र को आकाश, अक्ष को अग्नि, वृक्ष को भूमि एवं जल को जल तत्व से समझा जा सकता है. हमारे सनातन संज्ञान में शिव एवं रूद्र को स्पष्ट समझाने वाली सरल पुस्तके उपलब्ध नहीं होने से पूरी जानकारी सबके सामने नहीं है.

शिव हिमालय में शारीर पर मृग चरम, मस्तक पर चन्द्रमा गले में सर्प एवं माला के रूप में रुद्राक्ष ही धारण करते हैं मनुष्य जीवन में ज्ञान, कर्म एवं उपासना से सम्बंधित, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष से सम्बंधित तथा रज, सत एवं तम से सम्बंधित जो भी कुछ है रुद्राक्ष में समाया हुआ है.

रुद्राक्ष के विषय में गूढ़ ज्ञान हिमालय में तप करने वाले ऋषि-मुनियों के पास ही है, जिसके द्वारा वे अपनी साधना आराधना में लगे है प्राचीन काल से ही रुद्राक्ष सभी को अपनी और आकर्षित करता रहा है. और सभी ये समझते भी रहें हैं कि रुद्राक्ष का सम्बन्ध सिर्फ इसको धारण करने से है, रुद्राक्ष के धारण करने से सब्भी प्रकार की सुख -संपत्ति की प्राप्ति होगी, जिसके चलते भिन्न-भिन्न प्रकार के रुद्राक्ष धारण किये गए.

रुद्राक्ष के उत्पत्ति की कथा

वस्तुत: रुद्राक्ष शब्द का संधि विच्छेद है – रुद्र+अक्षि – अर्थात भगवान शिव का नेत्र। इसकी उत्पत्ति और नामकरण के पीछे यह कथा प्रचलित है कि त्रिपुरासुर का वध करते समय रुद्रावतार धारण किए भगवान शंकर की आंखों से बहने वाला जल रुद्राक्ष के रूप में पृथ्वी पर साकार हुआ। इसकी उत्पत्ति के संबंध में यह भी कहा जाता है कि जब हिमालय की पुत्री सती ने स्वयं को हवन कुंड में समाहित कर दिया था तो भगवान शिव ने रौद्र रूप धारण कर लिया था और सती का शव कंधे पर उठा कर ब्रह्मांड का विनाश करने के लिए तांडव नृत्य करने लगे। शिव जी को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र चलाया, जिससे सती के शरीर के कई टुकड़े हो गए। टुकड़े जहां-जहां हिस्सों में गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई। अंत में भगवान शिव के शरीर पर सिर्फ सती के शरीर का भस्म रह गया। जिसे देखकर वह रो पड़े। इस तरह भगवान शिव के आंसुओं से रुद्राक्ष की उत्पत्ति हुई।

स्वास्थ्यवर्धक औषधि

रुद्राक्ष एक वनस्पति है। इसके पेड़ पर बेर जैसे फल लगते है। ये पेड़ हिमालय की तराई में पाए जाते है। रुद्राक्ष के प्रभाव से आसपास का संपूर्ण वातावरण शुद्ध हो जाता है। इसे रातभर भिगोकर रखने के बाद और प्रात:काल नियमित रूप से खाली पेट इसका पानी पीना हृदय रोगियों के लिए बहुतलाभदायक साबित होता है।

मान्यता के अनुसार, 1 से लेकर 35 मुंह तक के रुद्राक्ष उपलब्ध है। विविध कार्यसिद्धि के लिए विभिन्न रुद्राक्ष उपयोग में लाए जाते है। लेकिन गौरी-शंकर नामक संयुक्त रुद्राक्ष, पैंतीस मुखी एवं एकमुखी रुद्राक्ष बहुत कम प्राप्त होते है। पुराना रुद्राक्ष अधिक प्रभावशाली होता है।

रुद्राक्ष के विभिन्न प्रकार

रुद्राक्ष की अलग-अलग किस्मों के लाभ भी अलग होते है। यहां प्रस्तुत है रुद्राक्ष के प्रमुख प्रकार और उनके फायदे:

एकमुखी रुद्राक्ष: यह आंख, नाक, कान और गले की बीमारियों को दूर करने में सहायक होता है।

द्विमुखी रुद्राक्ष: यह मस्तिष्क की शांति, धैर्य और सामाजिक प्रतिष्ठा की वृद्धि में सहायक होता है। साथ ही इसे धारण करने से पाचन तंत्र संबंधी समस्याएं भी काफी हद तक दूर हो जाती है।

पंचमुखी रुद्राक्ष: यह पंच ब्रह्म तत्व का प्रतीक है। यह युवाओं के जीवन को सही दिशा देता है। इससे धन और मान-सम्मान में वृद्धि होती है और यह उच्च रक्तचाप को भी नियंत्रित करता है।

सप्तमुखी रुद्राक्ष: यह भगवान कार्तिकेय का प्रतीक माना जाता है तथा इसे धारण करने से आंखों की दृष्टि में वृद्धि होती है।

आमतौर पर चतुर्मुखी रुद्राक्ष शिक्षा के क्षेत्र में सफलता के लिए, पंचमुखी रुद्राक्ष नित्य जप के लिए, षड्मुखी रुद्राक्ष पुत्र प्राप्ति के लिए, चतुर्दश एवं पंचदशमुखी रुद्राक्ष लक्ष्मी प्राप्ति के लिए तथा इक्कीस मुखी रुद्राक्ष ज्ञान प्राप्ति के लिए धारण करने की प्रथा है।

रुद्राक्ष धारण करने का तरीका

रुद्राक्ष स्वभाव से ही प्रभावी होता है, लेकिन यदि उसे विशेष पद्धति से सिद्ध किया जाए तो उसका प्रभाव कई गुना अधिक हो जाता है। अगर जप के लिए रुद्राक्ष की माला सिद्ध करनी हो तो सबसे पहले उसे पंचगव्य (गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का पानी को सामूहिक रूप से पंचगव्य कहा जाता है। )  में डुबोएं, फिर साफ पानी से धो लें। हर मनके पर ‘ईशान: सर्वभूतानां’ मंत्र का 10 बार जप करे।

यदि रुद्राक्ष के सिर्फ एक मनके को सिद्ध करना हो तो पहले उसे पंचगव्य (गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का पानी को सामूहिक रूप से पंचगव्य कहा जाता है।) से स्नान कराएं और उस पर गंगाजल का छिड़काव करें। उसके बाद षोडशोपचार से पूजा करके उसे चांदी के डिब्बे में रखें। हाथों में कुश लेकर उसका स्पर्श रुद्राक्ष से करके इच्छित इष्टमंत्र का जप करे।

विविध रुद्राक्ष विभिन्न कार्यो के लिए काम में लाए जाते है। इसलिए उनके मंत्र एवं सूक्त भी अलग-अलग है। श्रीसूक्त, विष्णुसूक्त, पवमान रुद्र, मन्युसूक्त, चतुर्दश प्रणवात्मक महामृत्युंजय, शांतिसूक्त, रुद्रसूक्त तथा सौरसूक्त आदि का उपयोग कार्यानुसार रुद्राक्ष सिद्धि के लिए किया जाता है। रुद्राक्ष सिद्ध करना सहज है, लेकिन उसकी सिद्धि बनाए रखना मुश्किल है। असत्य वचन और बुरे व्यवहार आदि कारणों से रुद्राक्ष की सिद्धि कम हो जाती है। अत: इसे धारण करने वाले व्यक्ति को सदाचार का पालन करना चाहिए। गले में 108 या 32 रुद्राक्षों की माला पहनने की प्रथा है। हाथों में भी 27, 54 या 108 रुद्राक्षों की माला पहननी चाहिए। भगवान शिव का पूजन करते समय रुद्राक्ष अवश्य धारण करे। शरीर से रुद्राक्ष का स्पर्श होना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। देवाधिदेव भगवान भोलेनाथ की उपासना में रुद्राक्ष का अत्यन्त महत्व है। रुद्राक्ष शब्द की विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसकी उत्पत्ति महादेव जी के अश्रुओं से हुई है- रुद्रस्य अक्षि रुद्राक्ष:,अक्ष्युपलक्षितम् अश्रु, तज्जन्य: वृक्ष: शिव महापुराण की विद्येश्वरसंहिता तथा श्रीमद्देवीभागवत में इस संदर्भ में कथाएं मिलती हैं – उनका सारांश यह है कि अनेक वर्षो की समाधि के बाद जब सदाशिव ने अपने नेत्र खोले, तब उनके नेत्रों से कुछ आँसू पृथ्वी पर गिरे और उनके उन्हीं अश्रु बिन्दुओं से रुद्राक्ष के महान वृक्ष उत्पन्न हुए, रुद्राक्ष धारण करने से तन-मन में पवित्रता का संचार होता है ।

रुद्राक्ष पापों के बडे से बडे समूह को भी भेद देते हैं… चार वर्णो के अनुरूप ये भी श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण वर्ण के होते हैं…ऋषियों का निर्देश है कि मनुष्य को अपने वर्ण के अनुसार रुद्राक्ष धारण करना चाहिए । भोग और मोक्ष, दोनों की कामना रखने वाले लोगों को रुद्राक्ष की माला अथवा मनका जरूर पहनना चाहिए, विशेषकर शैव मताबलाम्बियो के लिये तो रुद्राक्ष को धारण करना अनिवार्य ही है। जो रुद्राक्ष आँवले के फल के बराबर होता है, वह समस्त अरिष्टों का नाश करने में समर्थ होता है । जो रुद्राक्ष बेर के फल के बराबर होता है, वह छोटा होने पर भी उत्तम फल देने वाला व सुख-सौभाग्य की वृद्धि करने वाला होता है। गुंजाफल के समान बहुत छोटा रुद्राक्ष सभी मनोरथों को पूर्ण करता है। रुद्राक्ष का आकार जैसे-जैसे छोटा होता जाता है, वैसे-वैसे उसकी शक्ति उत्तरोत्तर बढती जाती है। विद्वानों ने भी बडे रुद्राक्ष से छोटा रुद्राक्ष कई गुना अधिक फलदायी बताया है किन्तु सभी रुद्राक्ष नि:संदेह सर्वपापनाशक तथा शिव-शक्ति को प्रसन्न करने वाले होते हैं – सुंदर, सुडौल, चिकने, मजबूत, अखण्डित रुद्राक्ष ही धारण करने हेतु उपयुक्त माने गए हैं जिसे कीडों ने दूषित कर दिया हो, जो टूटा-फूटा हो, जिसमें उभरे हुए दाने न हों, जो व्रणयुक्त हो तथा जो पूरा गोल न हो, इन पाँच प्रकार के रुद्राक्षों को दोषयुक्त जानकर त्याग देना ही उचित है। जिस रुद्राक्ष में अपने-आप ही डोरा पिरोने के योग्य छिद्र हो गया हो, वही उत्तम होता है… जिसमें प्रयत्न से छेद किया गया हो, वह रुद्राक्ष कम गुणवान माना जाता है।

रुद्राक्ष, तुलसी आदि दिव्य औषधियों की माला धारण करने के पीछे वैज्ञानिक मान्यता यह है कि होंठ व जीभ का प्रयोग कर उपांशु जप करने से साधक की कंठ-धमनियों को सामान्य से अधिक कार्य करना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप कंठमाला, गलगंड आदि रोगों के होने की आशंका होती है। उसके बचाव के लिए गले में उपरोक्त माला पहनी जाती है।

रुद्राक्ष अपने विभिन्न गुणों के कारण व्यक्ति को दिया गया ‘प्रकृति का अमूल्य उपहार है’ मान्यता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के नेत्रों से निकले जलबिंदुओं से हुई है. अनेक धर्म ग्रंथों में रुद्राक्ष के महत्व को प्रकट किया गया है जिसके फलस्वरूप रुद्राक्ष का महत्व जग प्रकाशित है. रुद्राक्ष को धारण करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं इसे धारण करके की गई पूजा हरिद्वार, काशी, गंगा जैसे तीर्थस्थलों के समान फल प्रदान करती है. रुद्राक्ष की माल द्वारा मंत्र उच्चारण करने से फल प्राप्ति की संभावना कई गुना बढ़ जाती है. इसे धारण करने से व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है. रुद्राक्ष की माला अष्टोत्तर शत अर्थात 108 रुद्राक्षों की या 52 रुद्राक्षों की होनी चाहिए अथवा सत्ताईस दाने की तो अवश्य हो इस संख्या में इन रुद्राक्ष मनकों को पहना विशेष फलदायी माना गया है. शिव भगवान का पूजन एवं मंत्र जाप रुद्राक्ष की माला से करना बहुत प्रभावी माना गया है तथा साथ ही साथ अलग-अलग रुद्राक्ष के दानों की माला से जाप या पूजन करने से विभिन्न इच्छाओं की पूर्ति होती है.धारक को शिवलोक की प्राप्ति होती है, पुण्य मिलता है, ऐसी पद्मपुराण, शिव महापुराण आदि शास्त्रों में मान्यता है।

शिवपुराण में कहा गया है :

यथा च दृश्यते लोके रुद्राक्ष: फलद: शुभ:।
न तथा दृश्यते अन्या च मालिका परमेश्वरि:।।

अर्थात विश्व में रुद्राक्ष की माला की तरह अन्य कोई दूसरी माला फलदायक और शुभ नहीं है। 

श्रीमद्- देवीभागवत में लिखा है :

रुद्राक्षधारणाद्य श्रेष्ठं न किञ्चिदपि विद्यते।

अर्थात विश्व में रुद्राक्ष धारण से बढ़कर श्रेष्ठ कोई दूसरी वस्तु नहीं है।

रुद्राक्ष दो जाति के होते हैं-  रुद्राक्ष एवं भद्राक्ष

रुद्राक्ष के मध्य में भद्राक्ष धारण करना महान फलदायक होता है- रुद्राक्षाणांतुभद्राक्ष:स्यान्महाफलम् – रुद्राक्ष-धारण करने से पहले उसके असली होने की जांच अवश्य करवा लें। असली रुद्राक्ष ही धारण करें। खंडित, कांटों से रहित या कीड़े लगे हुए रुद्राक्ष धारण नहीं करें।

कितनी हो माला में रुद्राक्ष की संख्या?

माला में रुद्राक्ष के मनकों की संख्या उसके महत्व का परिचय देती है. भिन्न-भिन्न संख्या मे पहनी जाने वाली रुद्राक्ष की माला निम्न प्रकार से फल प्रदान करने में सहायक होती है जो इस प्रकार है:

  • रुद्राक्ष के सौ मनकों की माला धारण करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है
  • रुद्राक्ष के एक सौ आठ मनकों को धारण करने से समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होती है. इस माला को धारण करने वाला अपनी पीढ़ियों का उद्घार करता है
  • रुद्राक्ष के एक सौ चालीस मनकों की माला धारण करने से साहस,पराक्रम और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है
  • रुद्राक्ष के बत्तीस दानों की माला धारण करने से धन, संपत्ति एवं आय में वृद्धि होती है
  • रुद्राक्ष के 26 मनकों की माला को सर पर धारण करना चाहिए
  • रुद्राक्ष के 50 दानों की माला कंठ में धारण करना शुभ होता है
  • रुद्राक्ष के पंद्रह मनकों की माला मंत्र जप तंत्र सिद्धि जैसे कार्यों के लिए उपयोगी होती है
  • रुद्राक्ष के सोलह मनकों की माला को हाथों में धारण करना चाहिए
  • रुद्राक्ष के बारह दानों को मणिबंध में धारण करना शुभदायक होता है
  • रुद्राक्ष के 108, 50 और 27 दानों की माला धारण करने या जाप करनेसे पुण्य की प्राप्ति होती है

किस कार्य हेतु केसी माला धारण करें ???

तनाव से मुक्ति हेतु 100 दानों की, अच्छी सेहत एवं आरोग्य के लिए 140 दानों की, अर्थ प्राप्ति के लिए 62 दानों की तथा सभी कामनाओं की पूर्ति हेतु 108 दानों की माला धारण करें। जप आदि कार्यों में 108 दानों की माला ही उपयोगी मानी गई है। अभीष्ट की प्राप्ति के लिए 50 दानों की माला धारण करें। 26 दानों की माला मस्तक पर, 50 दानों की माला हृदय पर, 16 दानों की माला भुजा पर तथा 12 दानों की माला मणिबंध पर धारण करनी चाहिए।

क्या महत्त्व हें रुद्राक्ष की माला का ???

रुद्राक्ष की माला को धारण करने पर इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है कि कितने रुद्राक्ष की माला धारण कि जाए. क्योंकि रुद्राक्ष माला में रुद्राक्षों की संख्या उसके प्रभाव को परिलक्षित करती है. रुद्राक्ष धारण करने से पापों का शमन होता है. आंवले के सामान वाले रुद्राक्ष को उत्तम माना गया है. सफेद रंग का रुद्राक्ष ब्राह्मण को, रक्त के रंग का रुद्राक्ष क्षत्रिय को, पीत वर्ण का वैश्य को और कृष्ण रंग का रुद्राक्ष
शुद्र को धारण करना चाहिए.

क्या नियम पालन करें जब करें रुद्राक्ष माला धारण ?

क्या सावधानियां रखनी चाहिए रुद्राक्ष माला पहनते समय?

जिस रुद्राक्ष माला से जप करते हों, उसे धारण नहीं करें। इसी प्रकार जो माला धारण करें, उससे जप न करें। दूसरों के द्वारा उपयोग में लाए गए रुद्राक्ष या रुद्राक्ष माला को प्रयोग में न लाएं।

रुद्राक्ष की प्राण-प्रतिष्ठा कर शुभ मुहूर्त में ही धारण करना चाहिए –

ग्रहणे विषुवे चैवमयने संक्रमेऽपि वा। दर्द्गोषु पूर्णमसे च पूर्णेषु
दिवसेषु च। रुद्राक्षधारणात् सद्यः सर्वपापैर्विमुच्यते॥

ग्रहण में, विषुव संक्रांति (मेषार्क तथा तुलार्क) के दिनों, कर्क और मकर संक्रांतियों के दिन, अमावस्या, पूर्णिमा एवं पूर्णा तिथि को रुद्राक्ष धारण करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। 

मद्यं मांस च लसुनं पलाण्डुं द्गिाग्रमेव च। श्लेष्मातकं विड्वराहमभक्ष्यं वर्जयेन्नरः॥ (रुद्राक्षजाबाल-17)

 रुद्राक्ष धारण करने वाले को यथासंभव मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहजन (मुनगा), निसोडा और ड्वराह (ग्राम्यशूकर) का परित्याग करना चाहिए।

सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी प्रकृति के मनुष्य वर्ण, भेदादि के अनुसार विभिन्न प्रकर के रुद्राक्ष धारण करें। रुद्राक्ष को द्गिावलिंग अथवा द्गिाव-मूर्ति के चरणों से स्पर्द्गा कराकर धारण करें। रुद्राक्ष हमेशा  नाभि के ऊपर शरीर के विभिन्न अंगों (यथा कंठ, गले, मस्तक, बांह, भुजा) में धारण करें, यद्यपि शास्त्रों में विशेष परिस्थिति में विद्गोष सिद्धि हेतु कमर में भी रुद्राक्ष धारण करने का विधान है।

रुद्राक्ष अंगूठी में कदापि धारण नहीं करें, अन्यथा भोजन-द्गाचादि क्रिया में इसकी पवित्रता खंडित हो जाएगी। रुद्राक्ष पहन कर किसी अंत्येष्टि-कर्म में अथवा प्रसूति-गृह में न जाएं।

स्त्रियां मासिक धर्म के समय रुद्राक्ष धारण न करें। रुद्राक्ष धारण कर रात्रि शयन न करें। रुद्राक्ष में अंतर्गर्भित विद्युत तरंगें होती हैं जो शरीर में विद्गोष सकारात्मक और प्राणवान ऊर्जा का संचार करने में सक्षम होती हैं। इसी कारण रुद्राक्ष को प्रकृति की दिव्य औषधि कहा गया है। अतः रुद्राक्ष का वांछित लाभ लेने हेतु समय-समय पर इसकी साफ-सफाई का विद्गोष खयाल रखें। शुष्क होने पर इसे तेल में कुछ समय तक डुबाकर रखें।

रुद्राक्ष स्वर्ण या रजत धातु में धारण करें। इन धातुओं के अभाव में इसे ऊनी या रेशमी धागे में भी धारण कर सकते हैं। रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को लहसुन, प्याज तथा नशीले भोज्य पदार्थों तथा मांसाहार का त्याग करना चाहिए. सक्रांति, अमावस, पूर्णिमा और शिवरात्रि के दिन रुद्राक्ष धारण करना शुभ माना जाता है. सभी वर्ण के मनुष्य रुद्राक्ष को पहन सकते हैं. रुद्राक्ष का उपयोग करने से व्यक्ति भगवान शिव के आशीर्वाद को पाता है. व्यक्ति को दिव्य-ज्ञान की अनुभूति होती है. व्यक्ति को अपने गले में बत्तीस रुद्राक्ष, मस्तक पर चालीस रुद्राक्ष, दोनों कानों में 6,6 रुद्राक्ष, दोनों हाथों में बारह-बारह, दोनों भुजाओं में सोलह-सोलह, शिखा में एक और वक्ष पर एक सौ आठ रुद्राक्षों को धारण करता है, वह साक्षात भगवान शिव को पाता है.

किस तरह धारण करें रुद्राक्ष माला को ?


अधिकतर रुद्राक्ष यद्यपि लाल धागे में धारण किए जाते हैं, किंतु एक मुखी रुद्राक्ष सफेद धागे, सात मुखी काले धागे और ग्यारह, बारह, तेरह मुखी तथा गौरी-शंकर रुद्राक्ष पीले धागे में भी धारण करने का विधान है। अतः यह विधान किसी योग्य पंडित से संपन्न कराकर रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। ऐसा संभव नहीं होने की स्थिति में नीचे प्रस्तुत संक्षिप्त विधि से भी रुद्राक्ष की प्राण प्रतिष्ठा कर सकते हैं। रुद्राक्ष धारण करने के लिए शुभ मुहूर्त या दिन का चयन कर लेना चाहिए। इस हेतु सोमवार उत्तम है।

धारण के एक दिन पूर्व संबंधित रुद्राक्ष को किसी सुगंधित अथवा सरसों के तेल में डुबाकर रखें। धारण करने के दिन उसे कुछ समय के लिए गाय के कच्चे दूध में रख कर पवित्र कर लें। फिर प्रातः काल स्नानादि नित्य क्रिया से निवृत्त होकर क्क नमः शिवाय मंत्र का मन ही मन जप करते हुए रुद्राक्ष को पूजास्थल पर सामने रखें। फिर उसे पंचामृत (गाय का दूध, दही, घी, मधु एवं शक्कर) अथवा पंचगव्य (गाय का दूध, दही, घी, मूत्र एवं गोबर) से अभिषिक्त कर गंगाजल से पवित्र करके अष्टगंध एवं केसर मिश्रित चंदन का लेप लगाकर धूप, दीप और पुष्प अर्पित कर विभिन्न शिव मंत्रों का जप करते हुए उसका संस्कार करें।

तत्पश्चात संबद्ध रुद्राक्ष के शिव पुराण अथवा पद्म पुराण वर्णित या शास्त्रोक्त बीज मंत्र का 21, 11, 5 अथवा कम से कम 1 माला जप करें। फिर शिव पंचाक्षरी मंत्र क्क नमः शिवाय अथवा शिव गायत्री मंत्र क्क
तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् का 1 माला जप करके रुद्राक्ष-धारण करें।

अंत में क्षमा प्रार्थना करें। रुद्राक्ष धारण के दिन उपवास करें अथवा सात्विक अल्पाहार लें। विद्गोष : उक्त क्रिया संभव नहीं हो, तो शुभ मुहूर्त या दिन में (विशेषकर सोमवार को) संबंधित रुद्राक्ष को कच्चे दूध, पंचगव्य, पंचामृत अथवा गंगाजल से पवित्र करके, अष्टगंध, केसर, चंदन, धूप, दीप, पुष्प आदि से उसकी पूजा कर शिव पंचाक्षरी अथवा शिव गायत्री मंत्र का जप करके पूर्ण श्रद्धा भाव से धारण करें।

एक से चौदहमुखी रुद्राक्षों को धारण करने के मंत्र क्रमश:इस प्रकार हैं-

1.ॐ ह्रींनम:, 2.ॐ नम:, 3.ॐ क्लींनम:, 4.ॐ ह्रींनम:, 5.ॐ ह्रींनम:, 6.ॐ ह्रींहुं नम:, 7.ॐ हुं नम:, 8.ॐ हुं नम:, 9.ॐ ह्रींहुं नम:, 10.ॐ ह्रींनम:, 11.ॐ ह्रींहुं नम:, 12.ॐ क्रौंक्षौंरौंनम:, 13.ॐ ह्रींनम:, 14.ॐ नम:

निर्दिष्ट मंत्र से अभिमंत्रित किए बिना रुद्राक्ष धारण करने पर उसका शास्त्रोक्त फल प्राप्त नहीं होता है और दोष भी लगता है.

मित्रों अपने बहुमूल्य विचार हमें नीचे Comment के माध्यम से दें! धन्यवाद्!

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