स्वामी श्रद्धानंद प्रेरक प्रसंग – Swami Shraddhanand Inspirational Story

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दोस्तों, स्वामी श्रद्धानंद के शिष्य थे सदानंद। उन्होंने काफी मेहनत से विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त किया था। लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें अपने ज्ञान पर अहंकार हो गया। धीरे – धीरे उनके व्यवहार में भी बदलाव आ गया। वह हर किसी को नीच दृष्टि से देखने लगे। यहां तक कि वह अपने साथ शिक्षा ग्रहण कर रहे अपने मित्रों से भी दूरी बनाकर रहने लगे। वह जब भी चलते , तनकर चलते।


यह बात स्वामी श्रद्धानंद जी तक भी पहुंची। पहले तो उन्हें लगा कि सदानंद के साथी ऐसे ही कह रहे हैं। हो सकता है सदानंद के किसी आचरण से इन्हें ठेस पहुंची हो। लेकिन एक दिन स्वामी श्रद्धानंद जी उनके सामने से गुजरे तो सदानंद ने उन्हें भी अनदेखा कर दिया और उनका अभिवादन तक नहीं किया। स्वामी श्रद्धानंद जी समझ गए कि इन्हें अहंकार ने पूरी तरह जकड़ लिया है और इनका अहंकार तोड़ना आवश्यक हो गया है, अन्यथा भविष्य में इन्हें दुर्दिन देखने पड़ सकते हैं। उन्होंने उसी समय सदानंद को टोकते हुए उन्हें अगले दिन अपने साथ घूमने जाने के लिए तैयार कर लिया।

अगली सुबह स्वामी श्रद्धानंद जी उन्हें वन में एक झरने के पास ले गए और पूछा – पुत्र , ज़रा बताओ तुम सामने क्या देख रहे हो ? सदानंद ने जवाब दिया – गुरु जी , पानी जोरों से नीचे बह रहा है और गिरकर फिर दोगुने वेग से ऊंचा उठ रहा है। स्वामी जी ने कहा – पुत्र , मैं तुम्हें यहां एक विशेष उद्देश्य से लाया था। जीवन में अगर ऊंचा उठकर आसमान छूना चाहते हो तो थोड़ा इस पानी की तरह झुकना भी सीख लो।

सदानंद अपने गुरु जी का आशय समझ गए और उन्होंने उसी समय उनसे अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी।

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