महान पृथ्वीराज चौहान – Great Pritviraaj Chavan

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हिन्दुओं के अंतिम सम्राट महान पृथ्वीराज चौहान (जन्म – सन् 1166 मृत्यु – सन्1192) चौहान वंश के हिंदू क्षत्रिय राजा थे जो उत्तरी भारत में 12 वीं सदी के उत्तरार्ध के दौरान अजमेर और दिल्ली पर राज्य करते थे। पृथ्वीराज को ‘राय पिथौरा’ भी कहा जाता है। वह चौहान राजवंश के प्रसिद्ध राजा थे। पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर राज्य के वीर राजपूत महाराजा सोमश्वर के यहाँ हुआ था। उनकी माता का नाम कपूरी देवी था जिन्हेँ पूरे बारह वर्ष के बाद पुत्र रत्न कि पृथ्वीराज के रूप में प्राप्ति हुई थी। पृथ्वीराज के जन्म से राज्य मेँ राजनीतिक खलबली मच गई उन्हेँ बचपन मेँ ही मारने के कई प्रयत्ऩ किए गए पर वे बचते गए। 


पृथ्वीराज चौहान जो कि वीर राजपूत योद्धा थे , बचपन से ही वीर और तलवारबाजी के शौकिन थे।उन्होँने बाल अवस्था मेँ ही शेर से खुनी लड़ाई कर उसका जबड़ा फाड़ डाला था. पृथ्वीराज ने अपनी राजधानी दिल्ली का नवनिर्माण किया! कहा जाता है कि पृथ्वीराज की सेना में तीन सौ हाथी तथा 3,00,000 पैदल सैनिक थे, जिनमें बड़ी संख्या में घुड़सवार भी थे.

तराइन का प्रथम युद्ध (गौरी की पराजय) – थानेश्वर से 14 मील दूर और सरहिंद के किले के पास तराइन नामक स्थान पर यह युद्ध लड़ा गया था। तराइन के इस पहले युद्ध में राजपूतों ने गौरी की सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। गौरी के सैनिक प्राण बचा कर भागने लगे। जो भाग गया उसके तो प्राण बच गए, किन्तु जो सामने आया उसे गाजर- मुली की तरह काट डाला गया। सुल्तान मुहम्मद गौरी युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ। अपने ऊँचे तुर्की घोड़े से वह घायल अवस्था में गिरने ही वाला था की युद्ध कर रहे उसके एक सैनिक की दृष्टि उस पर पड़ी। उसने बड़ी फुर्ती के साथ सुल्तान के घोड़े की कमान संभाल ली और कूद कर गौरी के घोड़े पर चढ़ गया और घायल गौरी को युद्ध के मैदान से निकाल कर ले गया। नेतत्व विहीन सुल्तान की सेना में खलबली मच चुकी थी। तुर्क सेनिक राजपूत सेना के सामने भाग खड़े हुए। पृथ्वीराज की सेना ने 80 मील तक इन भागते तुर्कों का पीछा किया। पर तुर्क सेना ने वापस आने की हिम्मत नहीं की। इस तरह चौहान ने गोरी को 17 बार खदेड़ा ,राजपुता की प्रथा है की वो निहत्थे दुश्मन पर हमला नहीं करते थे . और, इसी का फयदा उठाकर गौरी बार बार बचता गया और सम्राट चौहान के पैरों में गिर कर माफ़ी मांग लेता था!

पृथ्वीराज चौहान द्वारा राजकुमारी संयोगिता का हरण करके कन्नौज से ले जाना राजा जयचंद को बुरी तरह कचोट रहा था। उसके ह्रदय में अपमान के तीखे तीर चुभ रहे थे। वह किसी भी कीमत पर पृथ्वीराज का विध्वंश चाहता था। भले ही उसे कुछ भी करना पड़े। जयचंद ने राजपूतों के सभी भेद खोल दिए और गौरी की खुल कर मदद की . भयंकर युद्ध के बाद चौहान तथा राज कवि चंदबरदाई को बंदी बना लिया गया। युद्धबंधी के रूप में उसे गौरी के सामने ले जाया गया। जहाँ उसने गौरी को तीखी नज़रों से घुर के देखा। गौरी ने पृथ्वीराज को आँखें नीची करने के लिए कहा। पृथ्वीराज ने कहा की राजपूतो की आँखें केवल मृत्यु के समय नीची होती है। 

यह सुनते ही गौरी आगबबुला होते हुए उठा और उसने सैनिकों को लोहे के गरम सरियों से उसकी आँखें फोड़ने का आदेश दे दिया। असल कहानी यहीं से शुरू होती है। पृथ्वीराज को रोज अपमानित करने के लिए रोज दरबार में लाया जाता था। जहाँ गौरी और उसके साथी पृथ्वीराज का मजाक उड़ाते थे। उन दिनों पृथ्वीराज अपना समय अपने जीवनी लेखक और कवि चंदबरदाई के साथ बिताता था। चंदबरदाई ने ‘पृथ्वीराज रासो’ नाम से उसकी जीवनी कविता में पिरोई थी। उन दोनों को गौरी से बदला लेने का अवसर जल्द ही प्राप्त हो गया , जब गौरी ने तीरंदाजी का एक खेल अपने यहाँ आयोजित करवाया। पृथ्वीराज ने भी खेल में शामिल होने की इच्छा जाहिर की परन्तु गौरी ने कहा की वह कैसे बिना आँखों के निशाना साध सकता है। पृथ्वीराज ने कहा की यह उनका आदेश है। पर गौरी ने कहा एक राजा ही राजा को आदेश दे सकता है तब चंदबरदाई ने पृथ्वीराज के राजा होने का वृत्तांत उसे कहा। गौरी उसकी बातों से सहमत हो गया और उसको दरबार में बुलाया गया। वहां गौरी ने पृथ्वीराज से उसके तीरंदाजी कौशल को प्रदर्शित करने के लिए कहा। चंद बरदाई ने पृथ्वीराज को कविता के माध्यम से प्रेरित किया। जो इस प्रकार है- “चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान।” पृथ्वीराज चौहान ने इतना सुनते ही तीर को गौरी के सीने में उतार दिया और वो वहीँ तड़प तड़प कर मर गया। तो ऐसे थे महान पृथ्वीराज चौहान!

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